अनुराग अनंत की कविता – सलीका

पहाड़ चढ़ने का भी सलीक़ा है और उतरने का भी किसी को भुलाते हुए यदि सावधानी न बरती जाए तो भुलाना याद करना बन जाता है जीवन को अगर सलीक़े से न जिया जाए तो जीवन से जीवन जाता रहता है जैसे देह से जाते रहते हैं प्राण

किसी को बुलाओ तो ध्यान रहे आवाज़ में चुम्बक रहे लोहा-दिल लोग भी वापस आ सकते हैं इस बात पर बचा रहे यक़ीन ताकि बची रहे बुलाने की रस्म

पत्थरों को देखते समय पूरी कोशिश करना कि याद रहे, वे कभी मिट्टी थे इस तरह उनमें दूब उग सकने की संभावना हरी रहेगी पत्थरों पर उगी हुई दूब का दृश्य छत पर नाचता पंखा निहारते लोगों और पुल पर खड़े नदी देखते उदास सितारों के लिए जरूरी है

मृत्यु को देखने का सलीक़ा सीखते सीखते सीखोगे जीवन को देखते देखते जानोगे जीवन का अर्थ उदास रातों में बरसते पानी को डाकिया कहोगे जिस दिन स्मृति का अर्थ उसी दिन खुलेगा तुम्हारी हथेली पर कागज़ पर उतार लाओगे जिस दिन चाँद उस दिन आसमान को जेब में रखकर सारी पृथ्वी टहल आओगे तुम पांवों में पहनोगे जीवन का सबसे उदास हिस्सा और फिर तुम पाओगे कि कोई कांटा ऐसा नहीं जो भेद सके आगे बढ़ने की इच्छा का हृदय

तुम फूलों से बात करने का सलीक़ा सीखो पतझड़ के मौसम में बहुत जरूरी है मौसमों के दुःखों को भी सुना जाए

सूखी हुई नदी को पार मत करना यह किसी के बुरे दिनों में उसका अपमान करना है एक कवि ही तुम्हें बता सकता है किसी पत्र-हीन पेड़ की छांव में बैठने का सलीक़ा और टूट गया है जिसका हृदय उससे पूछना कैसे देखा जाए कटी हुई पतंग को ज़मीन पारी गिरते हुए और उसे लूटने के लिए भागते बच्चों को किसी तरह देखना है यह तो तुम्हें ख़ुद ही सीखना होगा

अपनी ही राख से कैसे बनाते हैं अपनी देह यह कोई कहानी नहीं बताएगी मृत्यु के बाद जीवित बचे रहने का सलीक़ा सीखने के लिए कितने बार मरना है यह किसी गणित या विज्ञान की किताब में नहीं लिखा यह सलीक़ा सीखा जा सकता है जीवन में डूबी उन जिद्दी आंखों से जिनका पानी भीषण सूखे के दिनों में भी नहीं मरता

अनुराग अनंत

अनुराग अनंत

नई पीढ़ी के चर्चित कवि

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