अलीगढ़ – रूढ़ियों और सामाजिक पाखंड की सच्ची तस्वीर

अलीगढ़

‘अलीगढ़’, यह कहानी है ए एम यू के प्रोफ़ेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की, जिन्हें ८ फ़रवरी, २०१० की मध्यरात्रि ऐसे वाक़ये से गुजरना पड़ा, जो कि उस चौसठ वर्षीय व्यक्ति को आने वाले दिनों में मृत्यु की दहलीज़ पर छोड़ जायेगा, यह शायद उन्हें भी नही मालूम था। मराठी साहित्य संग आधुनिक भारत भाषाओं के विभागाध्यक्ष सिरस के घर दो व्यक्ति अचानक पहुँचते हैं और उन्हें एक रिक्शा वाले के संग निजी क्षणों में लिप्त पाते हैं। अगली रोज़ ए एम यू प्रशासन इसे स्वयं की गरिमा के ख़िलाफ़ देखता है और श्रीनिवास को उनके पद से बर्खास्त कर दिया जाता है। मीडिया, अपनी शैली अनुसार बिना बात की तह में जाये इस पूरी घटना को प्रस्तुत करती है। सिरस का पुतला तक फूंका जाता है। इसी दौरान एक पत्रकार पूरे विषय को अलग दृष्टि से देखता है। और इस बात से विचलित होता है कि आख़िर कैसे कुछ लोग किसी भी व्यक्ति के घर बिना अनुमति के घुस सकते हैं और निजी क्षणों को क़ैद कर उसे सार्वजनिक कर सकते हैं, इसके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही क्यों नही होती ! इसके लिए न तो समलैंगिक होने को कारण बताया जा सकता है, न ही किसी अन्य चीज़ को, यहाँ सीधा-सीधा प्रश्न क़ानून द्वारा हर नागरिक को प्रदान की गयी सुरक्षा और निजता पर उठता है।


पत्रकार द्वारा लेख प्रकाशित होने के पश्चात समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले और धारा ३७७ में बदलाव के लिए संघर्षरत एन जी ओ आगे आता है और न्यायालय में ए एम यू के निर्णय के विपक्ष में अपनी बात रखता है। हालाँकि निर्णय सिरस के पक्ष में होता है पर यदि आप ध्यान दे तो पायेंगे कि न्यायालय में एक वरिष्ठ नागरिक को किन प्रश्नों से गुजरना पड़ता है, जो दर्शक को भीतर तक झँझोड़ने के लिए पर्याप्त है, जैसे कि – इस उम्र में भी वे सम्भोग में कैसे लिप्त रह लेते हैं, पुरुष की भूमिका में कौन था।


आगे चलते हुए श्रीनिवास कहते हैं कि यदि वे अमेरिका में होते तो अच्छा था, जहां समलैंगिकों को सम्मान दिया जाता है । उनका यह कथन हमारी सामाजिक व्यवस्था एवं आधुनिक भारत की संकीर्णता का दर्पण है, जहां देश के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में गिने जाने वाले ए एम यू के प्रबुद्ध जन श्रीनिवास के कृत्य को हराम तक कह देते हैं। और कुछ ही दिन बाद सिरस अपने घर में संदिग्ध हालातों में मृत पाए जाते हैं ।

अलीगढ़ फ़िल्म से एक दृश्य

अब यदि दृश्यों के पीछे की पड़ताल में जायें तो हम पायेंगे कि मनोज बाजपेयी के अभिनय द्वारा जो व्यक्ति हमारे समक्ष आया है, वह मानसिक स्तर पर हिचकिचाहट से भरा हुआ, काँपता शरीर, अकेलापन, उदास आँखें और अपनी शारीरिक बनावट पर चुप्पी साधे संतुष्ट । जिस समाज में समलैंगिकता को अपराध के रूप में देखा जा रहा हो, ऐसे में वह बस अपने में रहना चाहता है। इसी दौरान उसकी निजता को उछाला जाता है, जिससे वह नितांत लज्जारुण अनुभव करता है। उसके घर की बिजली काट दी गयी है, असहाय स्थितियों में बाहरी की तरह उसके साथ व्यवहार किया जा रहा है, और वह परास्त हो किसी तरह निर्वाह किए जा रहा है।


श्रीनिवास जीवन का प्रतिनिधित्व करते मर्म को साधे एक संवेदनशील कवि भी थे। उनके भीतर वह शायद उनका भावुक कला हृदय ही रहा होगा जिसने उन्हें इतनी जटिल स्थितियों में भी सरल बनाये रखा। पर उनके विपक्ष में जो वैचारिक वर्ग था, वह सभी नाज़ुक पक्षों से पृथक अपनी अड़ियल विचारधारा के प्रति तत्पर था। ज़ाहिर है इन सभी घटनाओं से श्रीनिवास बड़ी गहराई तक आहत अनुभव कर रहे थे। दो व्यक्ति अपने एकांत में, क्या करते हैं क्या नही, या फ़र्ज़ कीजिए आप अपने घर के भीतर क्या करते हैं, यह अधिकार आपका है। परंतु हमारे यहाँ, लोग स्वयं चाहे मानवता के पालन में धरा के नीचे धँसे हों, मगर अकारण रूढ़ियों को बचाए रखने के लिए दूसरे की शांति भंग करने से भी नही चूकते। यदि समलैंगिकता ही समस्या थी तो ऋग्वेद की एक ऋचा अनुसार – “ विकृतिः एव प्रकृतिः “ अर्थात् जो अप्राकृतिक दिखता है वह भी प्राकृतिक है और इसे भारतवर्ष में समलैंगिकता के प्रति सहिष्णुता के प्रतीक की तरह लिया गया। आजकल जिस तर्क का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है वह यह है कि यह अप्राकृतिक है अर्थात् हमारी नैतिकता के विरुद्ध है, जबकि इस तर्क की कोई वैज्ञानिक आधारशिला नही है। हमें कोई अधिकार नही है कि हम अपनी सुविधानुसार दूसरों को भी अपने बनाए हुए मापदंडों में ढालें। हमारे ग्रंथों में चाहे वात्स्यायन का कामसूत्र हो या महाभारत, समलैंगिकता और किन्नरों का उल्लेख भी पाया जाता है। यदि कोई यह कहता है कि उन्हें सम्मान की दृष्टि से नही देखा गया तो यह भी मानना होगा कि उन्हें अत्यधिक अपमानित दृष्टि से भी नही देखा गया। ऐसे में यह बात औचित्यपूर्ण ठहरती है कि बहुसंख्यकवाद और धर्मवाद के प्रभाव में समय के साथ सेक्सुअल माईनॉरिटी अपना अस्तित्व खोती चली गयी और आज भी अपने अधिकारों के लिए प्रयासरत है और अलीगढ़, इसी विपुल वाद विवाद से घटी घटना का एक उदाहरण पेश करती फ़िल्म है।


देवांश एकांत

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