देवांश दीक्षित की कहानी – वो

पारिजात के फूल बहुत पसंद हैं उसे, जिन्हें लगभग रोज ही तोड़कर खोंस लेती है वो कनखियों से छुआते हुए अपने कानों पर। बिखरे हुए बालों संग, वो घुल जाती है दोपहरी की सांय-सांय में, मानो शिव बटालवी के बिरहा का कोई फ़कीर हो।

लखनऊ के इमामबाड़े से यही लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर तंग गलियों से गुज़रते हुए एक तीन मंज़िला धर्मशाला जैसे मकान की दूसरी मंज़िल पर रहती है वो। आस-पास एक शिथिल वातावरण का वास है। किसी नौजवान सरकारी क्लर्क से शादी के पश्चात चार साल से यहां है। दोनों के आपसी सम्बन्ध भारतीय निम्न मध्यवर्गीय परिवेश अनुसार नाम भर के हैं। साधारण बात-चीत, शारीरिक जरूरतें और मासिक खर्च से अधिक कोई कार्यवाही नहीं होती। फिर भी बल्ब की तरह मुखमण्डल पर हंसी टाँगे, देखता हूँ उसे जीवन का निर्वाह करते।

दिन-भर का सारा काम निपटाकर, पैदल निकल पड़ती है इमामबाड़े से सटे एक छोटे से बगीचे की तरफ। जहां बैठी रहती है वो चुपचाप, कभी नरम दूब को उखाड़कर फेंकती, कभी अपनी हथेलियों से जमीन पर कोई अदृश्य चित्रकारी सी करती हुई। पारिजात के फूल बहुत पसंद हैं उसे, जिन्हें लगभग रोज ही तोड़कर खोंस लेती है वो कनखियों से छुआते हुए अपने कानों पर। बिखरे हुए बालों संग, वो घुल जाती है दोपहरी की सांय-सांय में, मानो शिव बटालवी के बिरहा का कोई फ़कीर हो। चेहरे पर एक सिफर जिसने खड़े कर दिए हों हाथ जीवन की रंगीनियों के प्रति। सहसा दोनों हाथों से लगभग क्रॉस बनाते हुए रख लेती है वो अपने ही हाथों को अपने सीने पर। मैं इस असफल आलिंगन के प्रयास को रोज देखता हूँ और यथास्थान रह जाता हूँ विवश। संध्या होते ही लौट पड़ती है वो अपने घर की तरफ। एक दुबला शरीर, तीस की आयु, गेहुआं रंग और नायलॉन की साड़ी पहने लम्बे डग भरती हुई, वो मुझे जाने-अनजाने दिलाती रहती है याद सत्यजीत रे की फ़िल्मी नायिकाओं की।

आठ साल पहले जब मैं उसके संग जी रहा था इस शहर को, वो सबसे अधिक ज़िद इसी बगीचे में आने की करती थी। कितना बालपन, कितना वात्सल्य था, मेरे हाथों को खींचते-खींचते आगे चलती हुई वो और उसके कदम से कदम मिलाता हुआ मैं। दीवारों पर मेरा नाम उकेरने की आदत थी उसे। मैं अक्सर टोकता, ” यह क्या बेकार हरकत है “, इसपर आँखें नचाकर कहती, “हुंह, एक तो तुम्हारा प्रचार कर रही हूँ, तुम हो कि मुफ्त का विज्ञापन भी मना कर रहे” और जोर से हंस पड़ती । एक रोज़ दोबारा टोकने पर वो कहती, ” क्या पता कल कहाँ हों हम, इसलिए हमें कैसे भी स्मृति चिन्ह, कहीं न कहीं छोड़ते रहने चाहिए।” उसका यह कथन मैं तब नहीं समझ पाया था, मगर इतने साल बाद आज जब उन दीवारों के सामने से गुज़रता हूँ, तो अपना नाम पढ़कर भूत में कही उस बात को महसूस कर पाता हूँ। उसकी लिखाई को छूकर अपने सुख को छूने का असफल प्रयत्न करता हूँ। ख़ैर इस प्रयत्न का श्रेय भी उसे ही देना चाहूंगा।

एक ज़रूरी क्रिया की तरह जाता हूँ अपने ही लिखे नाम को पढ़ने, क्यूंकि एक अंतराल के बाद हम जीवन से जा चुके व्यक्ति के लौटने की कामना से अधिक, उसके संग बितायी स्मृतियों को महत्वता देते हैं। व्यक्ति की शारीरिक मौजूदगी से अधिक, हम उस एक मानसिक परिवेश को जगह देते हैं, जिसमें बिना किसी द्वंद के कर सके विचरण बीत चुके समय में।

कोई सम्बन्ध जब अपने अंत को पहुंचने लगता है, तो आदमी चुपचाप बटोरना चाहता है अच्छे दिनों को और बचाना चाहता है उन्हें आछेप और बेतुकी बहसों में फंसकर दम तोड़ने से। क्यूंकि अंत में जीवन स्मृतियों की जमा पूंजी ही तो है, वर्तमान से अधिक भूत पर टिका हुआ। इसीलिए उस रोज़ उसके उठाये प्रश्चिन्हों पर मौन एकमात्र रास्ता नज़र आया था। हाँ, बस उसका हाथ थोड़ी देर और थामना चाहता था, समय को थोड़ा धीमा कर देना चाहता था। मगर वो चली गयी दूने वेग से हाथ छुड़ाकर और नहीं याद रहा मुझे फिर कभी कि मैंने कुल कितने पहर बिताये थे, उन हथेलियों के आँगन में।

पता नहीं किस हाल में है वो, क्या आज भी गंभीर विषयों पर सहसा ही हंस पड़ती है ? समय चक्र की परिधि में इतनी दूर हूँ कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। बस चला आता हूँ बगीचे के सामने बनी इस इमारत में उसे देखने, किसी आदत की तरह। वो भी रोज़ आती है बगीचे किसी जरुरी काम की तरह। इन आठ सालों में उसके रास्ते में कभी नहीं आया। भाग्य की भेंट चढ़ चुके प्रेम की मूक अभिव्यक्ति का यही एक अंतिम तरीका है।

एक और शाम होने को है, वो दोबारा घर वापस लौटने को है। तिसपे पीछे खड़ा एक लड़का किसी से फ़ोन पर फ़रमाता है ” सितारों को आँखों में महफूज रखना, बड़ी देर तक रात ही रात होगी, मुसाफिर हैं हम, मुसाफिर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।।”

मैं कहता हूँ “आमीन”।।

देवांश दीक्षित

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