मूनलाइट, स्वयं की ख़ोज

मूनलाइट फ़िल्म

मूनलाइट फ़िल्म पोस्टर : साभार IMDB

सिनेमा हम सभी के जीवन का एक बहुत अहम हिस्सा है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन में सिनेमा की दख़ल रहती ही है। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है, उसी तरह सिनेमा भी समाज को प्रतिबिम्बित करता है।


चूँकि सिनेमा सार्वभौमिक है – यह भाषा, संस्कृतियों, जातियों, धर्मों और राजनीति की सीमाओं को पार कर जाता है और इसीलिए सिनेमा में समाज का उचित चित्रण ज़रूरी है लेकिन भारतीय सिनेमा ने LGBTQIA+ समुदाय का इस हद तक गलत प्रतिनिधित्व किया कि LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के लिए इस समाज में अपना मार्ग प्रशस्त करना कठिन हो गया। कुछ फिल्में अपवाद के रूप में मौज़ूद है लेकिन यहाँ बहुमत की बात है।


मुख्यधारा की फिल्म में LGBTQIA+ का सकारात्मक एवं सटीक प्रतिनिधित्व बहुत ज़रूरी है। यह समलैंगिक युवाओं के बीच आत्म-स्वीकृति और आत्म-सम्मान में वृद्धि की भावना को पोषित करता है एवं उन्हें स्वयं के प्रति पूर्वाग्रहों से भरे व्यव्हार के प्रति सचेत होने में मदद करता है।


मूनलाइट इसी सन्दर्भ में एक ख़ास फिल्म है। यह फिल्म अपने सकारात्मक प्रतिनिधित्व और विचारशीलता के लिए जानी जाती है। यह फिल्म समलैंगिकता और पुरुषत्व के संबंध में रूढ़िवादी-पैटर्न को पहचानने की एक शानदार कोशिश है।

मेरा यह कहना बेमानी होगा कि फ़िल्म के दौरान कहानी के समलैंगिक नायक के साथ मैं आत्म-अन्वेषण की यात्रा पर निकला था। मुझे कहानी के मुख्य पात्र शिरॉन के जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। मैं सचेत हूँ कि मैं एक विषमलैंगिक पुरुष हूँ जो एक ऐसी फिल्म के बारे में लिख रहा हूँ जहाँ नायक विशेषाधिकारों से वंचित एक समलैंगिक अश्वेत पुरुष है। मेरा यह कहना भी कि यह एक सार्वभौमिक कहानी है ग़लत और आपत्तिजनक लग सकता है पर पाठक इस बात को समझें कि मेरे द्वारा फिल्म का सार्वभौमिक कहे जाने का आधार मानवता और निरीह मानवीय संवेदना है। मूनलाइट में समलैंगिकता का पहलू जितना मुखर है उतना ही मानवीय संवेदना का। इसीलिए फ़िल्म दर्शकों को वहाँ ले जाकर खड़ी कर देती है जहाँ हमारे इंसान होने के अलावा बाकी सभी सम्भावनायें गौण हो जाती हैं।


फ़िल्म को पूर्णतः समझने के लिये हमें फ़िल्म के परिवेश को थोड़ा समझ लेना चाहिए। फ़िल्म मियामी में आधारित है जहाँ अश्वेत समुदाय में पुरुषों का समाज निर्धारित रूढ़ियों (विषाक्त मर्दानगी, माचो मैन छवि) से विचलन उन्हें अपने ही समुदाय के सदस्यों द्वारा ‘बुली’ किए जाने का कारण बन जाता है। अश्वेत पुरुषों से अपेक्षा की जाती है कि वे भेद्यता और संवेदनशीलता को न्यूनतम स्तर पर व्यक्त करें। उपरोक्त सामाजिक परिवेश में मानसिक एवं भावनात्मक उथल-पुथल की स्थिति में किसी से मदद हेतु संवाद स्थापित करने की संभावना लगभग ख़त्म हो जाती है। विषाक्त मर्दानगी का यह सन्दर्भ पूरी फिल्म में अलग़-अलग़ स्तर पर ही सही लेकिन हमेशा केंद्र में रहता है।


मूनलाइट फिल्म में मुख्य पात्र शिरॉन को जीवन में तीन अलग़-अलग़ समय पर चित्रित किया गया है। हर हिस्सा शिरॉन की विशिष्ट प्रकृति के बारे में अपनी बात रखता है। पूरी फ़िल्म के दौरान विभिन्न अनुभवों से गुज़रते हुए शिरॉन की अपने शरीर और लैंगिकता के प्रति सजगता तो बढ़ती है लेकिन उसका अंतस हमेशा स्वयं की पहचान के साथ द्वन्द में रहता है ।

फिल्म की शुरुआत नौ-वर्षीय बालक शिरॉन जिसे उसके दुबली कद-काठी और शारीरिक बनावट की वजह से ‘लिटिल’ कहा जाने लगता है से शुरू होती है। किशोरावस्था में कदम रखते ही शिरॉन अपनी सामाजिक छवि के प्रति सचेत होने लगता है और उसके सहपाठियों के दुर्व्यवहार से जूझता रहता है। वह कहीं न कहीं इस बात से अभी तक सचेत नहीं है कि उसे अपनी माँ के प्यार और स्नेह की ज़रूरत है जो कि उसकी माँ उसे देने में असमर्थ है। सतही तौर पर उसकी माँ की नशे की लत इसकी एक प्रमुख वजह है।


इस समयबिंदु पर शिरॉन का ड्रग-डीलर जुआन से मिलना होता है। स्वयं को बुली सहपाठियों से बचाता शिरॉन जुआन के डोप हॉउस में छुपता है और वही उसकी मुलाक़ात जुआन से होती है। शिरॉन जिस के मन में हट्टे-कट्टे अश्वेत आदमियों की एक नकारात्मक छवि बनी हुई है, जुआन के सामने ख़ुद को व्यक्त करने में असमर्थ पाता है। यहाँ शिरॉन ने चुप्पी को एक डिफेंस-मैकेनिज्म की तरह इख़्तियार किया है जो कि असुरक्षा की भावना से उपजी है। अपने हमउम्र लड़कों से साथ पराया महसूस करने वाले शिरॉन के लिए इस चुप्पी का आदत बन जाना एक नैसर्गिक सी प्रतिक्रिया थी।


जुआन का शिरॉन की ज़िन्दगी में प्रवेश और उसके प्रति संवेदनशील होना कहानी के संदर्भ में अहम भूमिका अदा करता है। आगे जाकर धीमे-धीमे शिरॉन का जुआन के प्रति विश्वास बंधता है।


फ़िल्म में समुद्र को एक ख़ूबसूरत और गूढ़ रूपक की तरह उपयोग में लाया गया है। फ़िल्म के तीन खास हिस्से हैं और तीनों समुद्र के आसपास घटते हैं। समुद्र का अथाह विस्तार और शहर भर में व्याप्त उसकी आवाज़ को आदमी की आतंरिक पहचान के रूपक के तौर पर उपयोग में लाया गया है।

मूनलाइट फ़िल्म से एक दृश्य – जुआन और शिरॉन

फ़िल्म का अर्थ परिभाषित करने वाला पहला दृश्य है जुआन का शिरॉन को समंदर में तैरने सिखाने ले जाना। समंदर के भयावह प्लावन के बीचो-बीच शिरॉन का जुआन के प्रति पूर्ण समर्पण इस बात का घोतक है कि जुआन के साथ वह अब सुरक्षित महसूस करने लगा है। शिरॉन का पानी के भीतर और बाहर आना-जाना जिस खूबसूरती से फ़िल्म में दिखाया गया है वह एक खास सिम्बोलिस्म है। यह दर्शाता है कि वह किस तरह अपने अंतस और बाह्य के साथ द्वन्द में रहते हुए भी किसी तरह जीवन के धरातल पर टिका हुआ है।


इस दृश्य में कैमरे का सुन्दर प्रयोग हुआ है। कैमरा जल सतह पर रखा है, पानी लगातार लेंस से टकराता रहता है। शिरॉन पानी के बाहर-भीतर हो रहा है और यह घटना बिल्कुल शिरॉन के मौजूदा जीवन-स्थिति से साथ मेल खाती है। लेकिन यह जुआन है जो सुनिश्चित करता है कि वह कभी ख़तरे में नहीं है। इस प्रसंगोपरांत शिरॉन का जुआन के साथ एक गहरा संबंध स्थापित होता है।

यदि पहला दृश्य भावनात्मक अंतरंगता के बारे में है तो दूसरा शिरॉन की अपनी कामुकता के प्रति बढ़ती समझ और उसकी आवश्यकता से संबंधित है। चाँद की रोशनी में शिरॉन अपने बचपन के मित्र केविन के साथ उसी समुद्र तट पर बैठा हुआ है। वे दोनों भावनात्मक अथवा शारीरिक रूप से एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं लेकिन यह जताने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। उनके समक्ष उमड़ता-घुमड़ता एक विशाल समंदर है जो उनकी जगह उनके अनकहे सत्य को ज़ोर-ज़ोर से व्यक्त कर रहा है। चरम आकर्षण में शिरॉन और केविन एक दूसरे की ओर खिंचे चले आते हैं और यह शिरॉन के लिए सिर्फ़ पहला सेक्सुअल अनुभव ही नहीं था बल्कि उसकी लैंगिक पहचान का पुख्ता सत्यापन भी था। किंतु इस प्रसंग के बाद भी शिरॉन इस बारे में न कभी केविन से बात करता है न किसी और से जो कि इस बात की ओर संकेत करता है कि वह अब भी अपनी पहचान के साथ द्वंद में है।


तीसरा और क्लोजिंग सीन है 10 साल बाद वापिस शिरॉन का केविन से मिलने जाना। एक तरह से केविन और शिरॉन दोनों ही अपने सच्चे स्व नहीं बन पाए हैं। बहरहाल वयस्कों के रूप में दोनों किसी तरह स्वयं में संशोधन करने की कोशिश कर रहे हैं। केविन एकमात्र व्यक्ति है जो जानता है कि शिरॉन वास्तव में कौन है। शिरॉन की लैंगिक पहचान जानते हुए भी उसकी माँ और क़रीबी उसके संघर्ष से अनभिज्ञ रहते हैं। शिरॉन हमेशा केविन के साथ अपने असल रूप में होता है क्योंकि जुआन की तरह वह भी उसे हर बात के लिए आंकने और परखने की कोशिश नहीं करता है। जब आख़िरकार शिरॉन केविन के समक्ष यह स्वीकारता है की समुद्रतट पर गत प्रसंग के बाद से वह किसी के साथ अंतरंग नहीं हुआ है तब वह स्वयं के सत्य को भी स्वीकार लेता है। केविन शिरॉन की तरफ उन्मुख होता है और शिरॉन को बाहों में भर लेता है और फिल्म ख़त्म हो जाती है।

मूनलाइट के केंद्र में हमेशा शिरॉन की आत्म-अन्वेषी यात्रा रहती है। तमाम सामजिक और सामुदायिक तत्वों के सापेक्ष अपने सत्य को तौलना और एक ऐसे समाज में अपनी लैंगिक पहचान के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करना जो उसे लगातार चुनौती देता है और अक्सर उसे खारिज भी कर देता है – शिरॉन को संघर्षशील और द्वन्द में रखता है। मूनलाइट अश्वेत युवाओं पर प्रक्षेपित विषाक्त मर्दानगी के विरुद्ध उचित सवाल उठाती है और इन सब के बावज़ूद एक मानवीय अस्तित्व अपने बहुरंगी वैविध्य को लिए समाज-निर्धारित रूढ़ियों से निरंतर द्वंद के साथ जिस तरह विकसित होता है उस का एक सटीक बयान है।




शिवम तोमर

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