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अपनों की राख में चिंगारियाँ भी नहीं है अब — संदीप नाइक की कविताएं
कितना अभागा समय है कि अपनों की राख में चिंगारियाँ भी नहीं है अब मैं लौटना चाहता हूँ यहाँ का समूचा वातायन मुझे रोकता
HINDI
May 10, 2024
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