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मन की परतों को उघाड़ती कहानियाँ




'सगबग मन' युवा कथाकार दिव्या विजय का दूसरा कहानी संग्रह है। किसी युवा के‌ लिए अपनी मूल विधा में दूसरी पुस्तक कई तरीके से उसकी परीक्षा होती है। मसलन, क्या वह शुरुआती मोमेंटम को बनाए रख सका/सकी है? दिव्या की यह किताब पढ़ते हुए लगता है कि दिव्या ने अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर जाकर 'सगबग मन' की कहानियाँ लिखी हैं और ख़ूब लिखी हैं।


इस पुस्तक की कहानियों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। शुरुआती छ: कहानियाँ विभिन्न जटिल विषयों पर लिखी गई हैं जिनमें पात्रों का अंतर्द्वंद्व चुनौतीपूर्ण है। अंतिम तीन कहानियाँ प्रेम कहानियाँ हैं, जिनमें से दो अच्छी हैं। ‌


सबसे पहले बात करनी चाहिए पुस्तक की सबसे अच्छी कहानी की। 'यार-ए-ग़ार' को लॉन्ग टर्म में एक यादगार कहानी साबित होना चाहिए। तालिबानी पृष्ठभूमि में नागरिकों की दुर्दशा और बच्चों के शोषण कि यह नायाब कहानी है। और मूल रूप से यह कहानी है एक गिल्ट फीलिंग की जो ताउम्र बनी रहती है। इस कहानी को जिस तरह डूब कर लिखा गया है, उतना ही डूब कर इसे पढ़ा जाना चाहिए।


'मग़रिबी अंधेरे' संग्रह की दूसरी सबसे अच्छी कहानी है। यह कहानी समय के एकाधिक क्षितिजों पर एक साथ घटित होती है। लेखिका ने यहाँ सुपरनेचुरल एलिमेंट का सहारा लिया है लेकिन वह अतिरेक में नहीं है।


'महानगर की एक रात' कहानी स्त्री-पुरुष के द्वैत और अविश्वास को दो अलग-अलग धरातलों पर परखती है। डर के मनोविज्ञान से संबंधित कई अच्छे वाक्य हैं कहानी में। इस कहानी का अंत एक ओपन क्वेश्चन है। जिस तरह से कहानी बुनी गई है, उससे दो संभव अंतिम निष्कर्षों में से एक तक कम से कम मैं तो नहीं पहुंच पाया। इस तरह की कहानी के लिए मुझे यह सफलता प्रतीत होती है।


स्त्रियों का संघर्ष, स्त्री का मानसिक द्वंद्व और वर्जनाओं को तोड़ना 'काचर', 'पियरा गई बेला स्वंजन की' और 'यूँ तो प्रेमी पिचहत्तर हमारे' कहानियों में प्रदर्शित होते हैं। 'यूँ तो प्रेमी पिचहत्तर हमारे कहानी में' तथाकथित अच्छे घर की बहू का चोला उतारकर बैंकॉक के एक क्लब में नाचती मुख्य पात्र की मनोदशा इन पंक्तियों से समझी जा सकती है-

"आँख के किसी कोने से उसने देखा एक-दो आदमी सीने को दबाए खड़े हैं। उसका ऐसा असर, वह मदहोश हो रही है। …….. वह उन मर्दों की नज़दीकी चाहती भी नहीं पर उसके दिल पर ठंडक पड़ गई है। उसमें अभी इतनी कशिश है कि पेशेवर औरतों को भी पीछे छोड़ सके। वह जब चाहे, जो चाहे बन सकती है। उसकी डोर उसके ख़ुद के हाथ में है। उसकी नाचने की गति बढ़ गई है।"


'काचर' कहानी श्रमिक स्त्रियों और उनकी पर केंद्रित कहानी है। इस कहानी में ढाणियों का जीवन और परेशानियां, ऑर्गेनिक सब्जियों के नाम पर किसानों के नुकसान और उपभोक्ता से मनमांगी कीमत वसूलने की बाज़ार की चालाकी और वीडियो वायरल होने के दौर में पुलिस तंत्र द्वारा अपनाए जाने वाले नए हथकंडों को उजागर किया गया है।


अंतिम तीन प्रेम कहानियों में से 'वर्जिन गिफ्ट' और 'भय मुक्ति भिनसार' अच्छी हैं। 'वर्जिन गिफ्ट' मुंबई में एक सिद्धांतवादी लेखक के संघर्ष और एक चतुर व्यक्ति के बीच कंट्रास्ट को दिखाती है। कहानी का अंत इसे प्रेम कहानी से बढ़कर मध्यमवर्गीय ज़रूरतों को रेखांकित करती कहानी बना देता है ‌।


लेखिका भाषा के साथ भी खूब प्रयोग करती हैं। जैसे 'काचर' कहानी में राजस्थानी बोली है तो 'भय मुक्ति भिनसार' में बंगाली के शब्दों का प्रयोग हुआ है। यार-ए-ग़ार में 'बाज़' का उल्लेख कहानी को प्रामाणिकता देता है-


"बाज़... अफ़गानिस्तान का क़ौमी परिंदा। पतन के शौकीन दीवानावार इस पतंग को चाहते हैं। बहुत क़ीमती होता है। किसी ख़ास दिन, ख़ास वजह होने पर लोग इसे उड़ाते हैं।"


इस संग्रह को एक युवा कथाकार की प्रगति यात्रा के तौर पर देखा जाना चाहिए।


~ देवेश‌ पथ सारिया


पुस्तक: सगबग‌ मन

लेखिका: दिव्या विजय

प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ

वर्ष: 2020

पृष्ठ: 164

 

दिव्या विजय एक हिंदी कथाकार हैं। उनका पहला कहानी संग्रह 'अलगोज़े की धुन पर' है, जिसके लिए उन्हें लिट-ओ-फेस्ट 2017 में सर्वश्रेष्ठ पांडुलिपि का पुरस्कार मिला।


समीक्षक : देवेश पथ सारिया हिंदी कवि-लेखक और अनुवादक हैं। उनकी कविताओं की पहली किताब ‘नूह की नाव’ हाल ही में साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुई है।



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