ताइवान के प्रति जिज्ञासा और प्रेम जगाती कविताएँ



उस छोटे से देश की ओर एक साम्राज्यवादी शक्ति की भृकुटियाँ तनी हैं। विराट समुद्र के ऊपर तैरता यह द्वीप अपनी अस्मिता के संघर्ष में जुटा है। उसी ताइवान में सीधी -सच्ची लोक की पीड़ा के समुद्र को पीती- जीती कविताएँ कही जाती हैं। इसी तरह की जीवंत कविता का सुंदर उदाहरण है ताइवान के वरिष्ठ कवि आलोचक ली मिन-युंग की कविता पुस्तक 'हक़ीक़त के बीच दरार'। इन कविताओं का मानीखेज अनुवाद किया है देवेश पथ सारिया ने ।


इस संग्रह से गुज़रते हुए यह बात बरबस ही महसूस होती है कि भारत की ही तरह ताइवान में भी वसुधैव कुटुंबकम की उदात्त भावना पाई जाती है। यही भावना है जो देश के साहित्यकारों के माध्यम से साहित्य की सुदीर्घ परम्परा, जीवंत इतिहास की नींव रखती है।


संग्रह की पहली कविता से ही आप ताइवान के प्रेम में पड़ जाते हैं। 'शताब्दियों के मिलन बिंदु पर प्रार्थना' कविता में युद्ध से उपजे विध्वंस और प्राकृतिक आपदा को याद करते हुए उजास की क्षणिक कौंध के साथ भावी जीवन की कल्पना है।


संग्रह की कई कविताओं में सड़क, शहर और पर्यावरण के परिदृश्य बेहद खूबसूरती से दर्शाए गए हैं । कवि का प्रकृति प्रेम कविताओं में पेड़ ,फूल -पत्तियों से उजागर होता है। कवि के लिए गिरी हुई पत्ती भी प्रेम पत्र है। उक्त कविता 'गिरी हुई पत्तियां' बेहद सुंदर है, जिसे प्रकृति और पर्यावरण प्रेमी होने के कारण मेरी बार-बार पढ़ने की इच्छा हुई।


प्रेम अंतहीन प्रतीक्षा के रूप में कई कविताओं में इस कदर गुम्फित है कि आप कवि की गहन अंतर्दृष्टि की दाद दिए बिना नहीं रह सकते। 'रुमाल' कविता अनन्य प्रेम और उसके वियोग से उपजे अंतहीन खालीपन को रुमाल के रूपक से खूब कुशलता से अभिव्यक्त करती है। शहीद सैनिक की प्रेयसी के पास सिर्फ रुमाल लौटकर आता है और लाता है स्मृतियों के अकथ गवाक्ष।


कवि का मन प्रत्यक्ष और परोक्ष परिवेश से छटपटाते हुए व्याकुल हो जाता है। प्रदूषण' कविता की ये पंक्तियां देखें:


"क़त्ल की गई ज़मीन

से आती है

दुर्गंध

पक्षियों और जानवरों के शवों की"


क्या विकास ने हमारी धरती माता की आत्मा का क़त्ल नहीं किया है ?


कुछ कविताओं में निर्वासन से उपजा मौन खुल कर शोर करता है। इन गहन पंक्तियों पर विचार कीजिए:


"निर्वासन में एक सड़क

पीछे की ओर जाती है"


'कुर्दिस्तान के नाम एक पत्र' कविता में कुर्दिस्तान के कुनबे के लिए चिंता है, साथ ही कवि उसके बेहतर भविष्य की कामना भी करता है। यह कवि पहचान की लड़ाई लड़ते हर समुदाय के साथ खड़ा है। उसका यह इरादा 'निर्वासित चित्रकार' कविता में स्पष्ट रूप से ज़ाहिर होता है। वर्तमान में जब अफगानिस्तान में तालिबान का आधिपत्य स्थापित हो चुका है और भविष्य के प्रति पूरा विश्व चिंतामग्न है। वहां के निवासी पलायन कर रहे हैं, तब निर्वासन को संबोधित कविताएं सहज ही उल्लेखनीय हो जाती हैं।


ताइवानी कवि ली मिन युंग और अनुवादक देवेश पथ सारिया

संग्रह में कविता के बारे में भी कुछ कविताएं हैं । जैसे 'कविता बतौर इतिहास', 'कविता की ढाल' और 'कविता है....'। एक रचना (कविता है....) की अंतिम पंक्तियाँ बताती हैं कि कविता के गंभीर साधक के लिए कविता को सिर्फ बाहरी चमक नहीं होना चाहिए।


'भागने का एक सपना' कविता जहाँ एक ओर कवि की व्यथा दर्शाती है वहीं आस का घरौंदा भी बुनती है। प्रश्न और उत्तर शैली में लिखी गयी इस कविता की ये दो पंक्तियां अनूठी हैं -


"तुम अपने सपने में भागे क्यों जा रहे हो ?

क्योंकि भागकर ही

मुक्त हुआ जा सकता है...."



'अंधेरा कमरा' एक छोटी सी कविता है पर है मानीखेज। इस पुस्तक का शीर्षक जिस कविता से लिया गया है, वह संग्रह की आखिरी कविता 'स्वप्न' है:


"रात गहराने के बाद

हक़ीक़त के बीच थी एक दरार

जिससे होकर मैं बच निकला"


विगत छह वर्षों से ताइवान में पोस्टडॉक्ट्रल फेलो देवेश पथ सारिया ने यह किताब ताइवान की मिट्टी और आबोहवा को समर्पित की है। इतने लंबे समय तक ताइवान में रहना अनुवादक की दृष्टि को वहां की कविताओं के मर्म के प्रति सजग बनाता है। देवेश पथ सारिया ने अनुवाद करते हुए कविता के मूल भाव को रखने की भरसक कोशिश की है। चूंकि यह उनकी पहली किताब है अतः उनसे आगामी किताबों में एक कुशल अनुवादक होने की उम्मीद की जा सकती है।


संग्रह की एक सफलता यह भी है कि इसे पढ़कर आप ताइवान के बारे में, उसके संघर्ष के बारे में और जानना चाहते हैं । इस छोटे से द्वीप के लोक की विराट जिजीविषा के बारे में, उस उम्मीद भरे सपने के बारे में जो देशप्रेम जगाते हुए ताइवान के भविष्य के लिए कर्मठ रहने की सुंदर चेतना का विकास कर रहा है । इस कविता के रास्ते पर चलते -चलते सचमुच इस छोटे से द्वीप के इतिहास‌ और वर्तमान सहित कवि की आंखों में बसे ताइवान के भविष्य को आप समुच्चय के तौर पर जान जाएंगे।


संग्रह के अंतिम पृष्ठ तक पहुंचते-पहुंचते आप स्वयं भी आगे क़दम बढ़ाते हैं। आप भी कवि‌ ली मिन-युंग के साथ ताइवान के सुखद भविष्य के सपने लेने लगते हैं।

 

सोनू यशराज

सूचना, शिक्षा व संचार सलाहकार और यायावरी के अनुभव को साधती साहित्यकार

किताब - पहली बूंद नीली थी

कविताएँ अनेक भाषाओँ में अनूदित !

कृति सम्मान 2021

सम्पर्क सूत्र : sonuyashraj5@gmail.com

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