अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस – चार कविताएं



बच्चे, तुम अपने घर जाओ / गगन गिल


बच्चे, तुम अपने घर जाओ


घर कहीं नहीं है?

तो वापस कोख़ में जाओ


मां की कोख नहीं है?

पिता के वीर्य में जाओ


पिता कहीं नहीं है?

तो मां के गर्भ में जाओ


गर्भ का अण्डा बंजर?

तो मुन्ना झर जाओ तुम

उसकी माहवारी में


जाती है जैसे उसकी

इच्छा संडास के नीचे

वैसे तुम भी जाओ

लड़की को मुक्त करो अब

बच्चे, तुम अपने घर जाओ।


 

अपराजिता / कात्यायनी


(सृष्टिकर्ता ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, ज़ेवर, अपवित्र इच्छाएँ, ईर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया -'मनु')

उन्होंने यही

सिर्फ़ यही दिया हमें

अपनी वहशी वासनाओं की तृप्ति के लिए

दिया एक बिस्तर

जीवन घिसने के लिए, राख होते रहने के लिए

चौका-बरतन करने के लिए बस एक घर

समय-समय पर

नुमाइश के लिए गहने पहनाए

और हमारी आत्मा को पराजित करने के लिए

लाद दिया उस पर

तमाम अपवित्र इच्छाओं और दुष्कर्मों का भार।


पर नहीं कर सके पराजित वे

हमारी अजेय आत्मा को

उनके उत्तराधिकारी

और फिर उनके उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारी भी

नहीं पराजित कर सके जिस तरह

मानवता की अमर-अजय आत्मा को

उसी तरह नहीं पराजित कर सके वे

हमारी अजेय आत्मा को

आज भी वह संघर्षरत है

नित-निरंतर

उनके साथ

जिनके पास खोने को सिर्फ़ ज़ंजीरें ही हैं

बिल्कुल हमारी ही तरह !


 

स्त्री और घर / गीताश्री


1


एक स्त्री के कहाँ-कहाँ होते हैं घर

एक घर वह जहाँ होता है सिर्फ़ धड़

एक घर वह जहाँ रोपती है मन

एक घर वहाँ जहाँ बसती हैं उसकी असंख्य कामनाएँ,

या वो घर जहाँ जबरन युद्धबन्दियो की तरह ठूँस दी जाती है,

जीवन के बाक़ी दिन काटने के लिए.

या वह घर जहाँ अनवरत टकराती रहती है दीवारो से

लहूलुहान सपनो के साथ

एक घर वह जहाँ के सपने कभी नहीं देखे

अक्सर वही लटक जाता है उसके गले में,

स्त्री के होते हैं कुछ अदृश्य घर

जिसे ढोते हैं कुछ अदृश्य चेहरे.

कभी वह अदृश्य खूँटी से उतारती है

चुपचाप पहन लेती है सुरक्षा-कवच की तरह

वह अदृश्य घर से निकल ही नहीं पाती कभी

पँजेनुमा घर में कसमसाती हुई देखती है

एक और घर का सपना

जिसमें होना चाहिए आकाश की तरह खुला

मैदानो की तरह हरा

पहाड़ की तरह विशाल

झरने की तरह जीवन्त

फूलों की तरह रंगीन

वह जब चाहे इनमें विचर सके अपनी मर्ज़ी से

एक घर जो उल्टा धरा है उसके सिर पर

बटोरना चाहती है ताक़त कि दोनों हाथों से

उस उल्टे धरे घर को ढकेल सके परे

इस घर ने न उसे घर में रहने दिया ना बाहर

वह घर बाहर की यात्रा में,

एक यात्री की तरह ही देखती है, ख़ुद को,

हमेशा यात्रा पर जाने को तैयार दिखती है एक

ख़ानाबदोश,

कई-कई शहरो में कई घर उसे बुलाते हैं

कहीं भी रख नहीं पाती अपना ट्रैवलर सूटकेस,

निरन्तर पुकारते हैं कई कई घर

वह बँटी हुई घरो के खाँचो में

किसे माने किसे अपनाए और किसे कहे अपना घर

स्त्री का नहीं होता अपना घर

जैसे नहीं होती उसकी कोई जाति, धर्म

घर उसके लिए उतना ही ज़रूरी

जितना उसका होना, अपने लिए

इसीलिए

उसे अब भी माँ के मुहावरे में यक़ीन है

कि जहाँ धड़ तहाँ घर.



2.


घर क्या उसके लिए वह अभेद्य दुर्ग हो सका

जहाँ सुरक्षित रह सकी उसकी इच्छाएँ

घर का साम्राज्य कभी उसके हिसाब से चल सका

जिसकी साम्राज्ञी वह बना दी गई

फिर उसी साम्राज्य में

एक कोने की तलाश में क्यों भटकती रही उसकी आत्मा


3.


घर ख़ानाबदोश स्त्री का सपना नहीं

परम्परा है

जिसे वह कबीलाई युग से अब तक

रोप रही है दूसरी स्त्री की आँखों में

फिर शुरू हो जाती है घर के लिए उसकी सारी कोशिशें

एक घर तक पहुँचने के लिए

पार करती है कितने कठिन समुद्र और पहाड़

नन्हीं आँखों में लौ की तरह टिमटिमाता रहता है

एक घर


4.


स्त्री को पसन्द नहीं

अस्त-व्यस्त घर

उनमें वह ख़ुद को तलाशती रह जाती है दिन भर

अपनी जगह की तलाश में बीत जाता है उसका सारा समय


 

स्त्री / जया जादवानी


एक


उसने कहा तुम मत जाओ

तुम्हारे बिना अधूरा हूं मैं

सारी की सारी गठरी धर मेरे सर पर

वह चल रहा आगे-आगे

मैं गठरी समेत उसके पीछे!


दो


जैसे हाशिये पर लिख देते हैं

बहुत फालतू शब्द और

उन्हें कभी नहीं पढ़ते

ऐसे ही वह लिखी गई और

पढ़ी नहीं गई कभी

जबकि उसी से शुरू हुई थी

पूरी एक किताब!


तीन


वह पलटती है रोटी तवे पर

बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया

खड़ी रहती है वहीं की वहीं

स्त्री

तमाम रोटियां सिंक जाने के बाद भी!


चार


वे हर बार छोड़ आती हैं

अपना चेहरा

उनके बिस्तर पर

सारा दिन जिसे बिताती हैं

ढूंढनने में

रात खो आती हैं!


पांच


पढ़ते हैं खुद

खुद नतीजे निकालते हैं

मेरी दीवारों पर क्या कुछ

लिख गए हैं लोग!



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